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साँझ के बदन पे


साँझ के बदन पे
लहराता बादलों का आँचल,
इक समाँ-सा बाँध चला है,,,
जी चाहता है
इस हसीं आँचल को
उचक के छू लूँ ज़रा,,,
छत पे बैठ,
भर-भर नैना
निहार लूँ उन्हें ज़रा,,,
यही सोच गयी ऊपर,
देखती रही
देSSSSSSर तलक
कितने रूप कितनी छबियां !!

तभी अचानक
नीचे उतरी इक टोली
और इक बादल बोला--
कैसी हो?
मैंने कहा,,
अच्छी हूँ |
तुम सब कैसे हो,
काफ़ी दिनों से
मिलना नहीं हुआ,
बहुत याद किया तुम्हें |
तो बोला बादल--
हम भी मस्त हैं,
तुम्हें याद करते हैं,
हाँ !
दूर है बहुत तुम्हारे घर से
हमारे घर का किनारा,
पर हवा के हर झोंके से
जान लेते हैं
हाल तुम्हारा |
मुस्कुरा दी मैं
और हाथ हिलाते
चल पडी
मस्त बादलों की टोली |

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