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ख़यालों की बारादरी में


ख़यालों की बारादरी में सरसराती यादों की महक
जहँ-तहँ ढूँढती है किसी अपने के रूठने का सबब |
कहाँ, कब कौन सा गुंचा अनजाने काँटों से बिंधा
माहताब-ए-आसमाँ हुजूम-ए-अब्रे-सियाह से ढका |
नीम-शब नज़रें भटकती हैं हैरान औ' परेशान
मंज़र-दर-मंज़र तलाशती नाराज़गी का सबब |
पशेमाँ किये है आसमाँ को किसी सितारे की टूटन
जुदाई में रोता है ज़ार-ज़ार औ' बरसती है शबनम |
____हिमांशु
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