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तपती दुपहरिया


तपती दुपहरिया
आग उगलती धरती
अगन बरसाता गगन |
धधकती लपटों की ज्वाला ने
कर दिया सबको बेज़ार,
पंछी, पशु, मनुज
सभी हैं इसके शिकार |

ज्येष्ठ का रौद्र मार्तण्ड
मानों अपने तूणीर से
तीक्ष्णतम शरों को
चुन-चुन कर
लक्ष्य-वेध कर रहा हो |
उफ़्फ़!
दिन में भी गर्मी,
रात को भी गर्मी,
सुबह भी तपती
सांझ भी उबलती,
हर सू
इसी गुस्सैल महारानी का
एकछत्र राज |
जाएँ तो जाएँ कहाँ ?
हर कोई
एक शीतल कोना तलाश
खुद को वहाँ
छिपा लेना चाहता है,
बचा लेना चाहता है
इस प्रचण्ड मार्तण्ड के आतप से |
पर कहीं सुकूँ नहीं
कहीं शान्ति नहीं
लगता है
`सेनापति जी' की छाया की तरह
आज की शीतलता भी
स्वयं कहीं कोना तलाश
जा छिपी है |
शिशिर-काल में
हिमांशु-सा शीतल
औ' सलोना दिनकर
ग्रीष्म-काल में
इतनी विकरालता के साथ !
क्या यह वही दिवाकर है?
कितने विविध रंग-रूप हैं
इस प्रकृति के भी!
______हिमांशु
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