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तरन्नुम बयार-ए-वादी का

तरन्नुम बयार-ए-वादी का
रवानी मचलती लहरों की
ऐसी ही फिज़ा हर ज़िंदगी में
आ जाए तो!
तितली-का फूल-फूल इठलाना
सतरंगी जहाँ में नींद भर सोना
ये सुकून हर भागती ज़िंदगी में
आ जाए तो!
सूरज का उगना, शान से उठना
वादियों में रंग बिखेर ढल जाना
ये रंगे उठान हर बेरंग-ज़िंदगी में
आ जाए तो!
शामे ज़िंदगी अपने काँधे पे उठा
सफ़र में उम्र की कंदील को जला
बहती हवा के संग चलना हरेक को
आ जाए तो!
हर किसी से बस यूँ ही कुछ ख़लिश
क्या फलसफा बना लिया जिंदगी का?
रिश्तों में वही नूर औ' तपिश फिर से
आ जाए तो!


______हिमांशु

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