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ये लो! चला अस्ताचल को ,,,,,,


ये लो! चला अस्ताचल को
फ़िर खुशियों भरा सूरज,
चहुँ ओर पसरी ख़ामोशी
छाया तम औ' सन्नाटा |

भुरभुराई दिल की धरती
वो भीगा मन का आँगन,
कुछ बीजे ग़म के दाने
शायद कुछ उगने को है!
तभी दूSSSर कहीं से
वो उठा हौले-हौले, औ'
छाया फ़लक-ए-मन पे
हसीं पुरनूर माहताब |
मन का आँगन गुदगुदाया,
उगी धानी लहलहाती फ़सल
फूटा सप्त-सुरी तरन्नुम
छाया सतरंगी इन्द्रधनुष |
छायीं फिर से वही खुशियाँ
मन-पंछी फिर गुनगुनाया
यही तो ज़िंदगी की माया
कभी धूप तो कभी छाया |
______हिमांशु

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