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ऐ मानस के हँसा!!!!!

ऐ मानस के हँसा!
तू मोती चुनना ना भूल |
होंगे बहुतेरे बगुले-कौए
मौजूद तेरे इर्द गिर्द,
कभी न होने देना
कलुषित स्वयं को |
यही तो तेरी है शान
ऐ श्वेत पाखी!
सबकी है अपनी-अपनी
नियति-प्रकृति,
हैं शतरंज के मोहरे,
सबकी है चाल जुदा
कोई ढाई चाल,
तो कोई तिरछा चले |
ये दुनिया है बनी
श्वेत-श्याम के मिश्रण से |
कोई पूर्णतः सुजन है
भ्रम न पालना,
किसी को दुर्जन मान
न उससे दूर भागना |
`सु' को ग्रहण कर
अपने श्वेत को
और-और निखारना,
`दु:' औ' `कु' को देख भी
अनदेखा ही करना |
यही तो है सिखाती
`सच्ची-शिक्षा' हमें |
_____हिमांशु महला

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