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धूप की चिरैया,,,,,

वो देखो !
भोर होते ही
प्राची के तरु से
आ बैठी मेरे झरोखे पे
धूप की चिरैया |
धीमे-धीमे
पंख पसार
झरोखे से दहलीज पे
औ' फिर आँगन में,
आँगन से चौबारे में,
कितनी सुकूनदायी,
कितनी गुनगुनी !
हर रोज
पौ फटते ही
इंतज़ार रहता है
आती भी है,
लेकिन दो दिन से
नदारद है |
किससे पूछूँ ?
कहाँ गयी ?
खिड़की में खड़ी
सोच ही रही थी
कि
तभी आसमान में
उड़ते आवारा बादल ने
रूककर हाथ हिलाया,
सोचा
सबका पता रखता है
इसी से हाल जानती हूँ |
बोला --
मुझसे ख़फ़ा है,
कहती है-
मैं उसका रास्ता रोकता हूँ,
उसे छिपा देता हूँ,,
पगली है !!!
समझती नहीं,
मैं तो प्यार से
आँख-मिचौनी खेलता हूँ,,
मैंने कहा---
ना सताया करो
भोली-भाली सी
प्यारी-सी
सबको भाती वो
धूप की चिरैया |
उसे कहना
ठिठुरती सर्दी में
सब याद करते हैं उसे,
कल ज़रूर आये
मेरे छज्जे पे |
इतराता बादल बोला--
ज़रूर कह दूंगा,
अभी तो
दो दिन से
सूरज दादा संग
दूसरे देस गयी है |
और फिर
हाथ हिलाता, मुस्कुराता
चल पड़ा अपनी मंज़िल,,,
मैंने सोचा,
कितना निष्फिक्र है यह !
लोग आवारा कहते हैं इसे
पर आवारा नहीं
आज़ाद है यह,,,
काश ! हम भी
अपने-अपने
अभिमान औ' गुरूर के
मक्कड़-जाल से निकल
इस जैसे आज़ाद
बन पाते |
___हिमांशु

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