image1 image2 image3

HELLO I'M Himanshu |WELCOME TO MY PERSONAL BLOG|I LOVE BEAUTY OF KNOWLEDGE|PRINICIPAL OF WPS

मन की कोर से उठी सदा,,,,,


कभी किसी की सदा
मन की कोर से उठी सदा
यूँ ही व्यर्थ नहीं जाती,,,

कभी घुलती है फ़िज़ाओं में
तो कभी हवाओं में
पराग-सी बिखर जाती है|

चटखती है कलियों में
उड़ ख़ुशबू परियों-सी
बागों में बिखर जाती है|

उमड़ती है घटाओं में
बन सावन की लड़ियाँ
परबत पे बरस जाती है|

दूर उत्ताल तरंगों में
बन चंचल जीवन संगीत
यूँ वो मचल जाती है|

तू आये ना आये,,,
तेरी यादों की घटा
कर मन-सावन में बसेरा
यूँ ही ठिनक जाती है |

_____हिमांशु

Share this:

CONVERSATION

0 टिप्पणियाँ:

टिप्पणी पोस्ट करें