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कभी कभी खामोशियाँ,,,,,

कभी कभी खामोशियाँ
बिना कुछ बोले ही
चुपके से
बहुत कुछ कह जाती हैं |

सरसराती- लहराती हवा
हौले से छूकर
झील के पानी में
तरन्नुम छेड़ देती है |
बूंदों की रिमझिमी धुन पे
इतराते, बल खाते हुए
पत्ते बूटे बरबस
यूँ ही नाच उठते हैं |
पहली बरखा की
सौंधी सौंधी सी खुशबू
हर मन-सरवर को
तरंगित कर देती है |
पर्बतों पर धीमे-धीमे
उतरती खूबसूरत सांझ
हर रोज पेड़ों को
दीवाना बना देती है |
श्रावणी बूंदों की लड़ियाँ,
बरबस ही, बिन बोले
धरा को धानी चुनर से
सजा-सँवार देती हैं |
वादियों पर बिखरी
सुबह की अरुणिमा
पर्बतों के दिल
झंकृत कर देती है |
शबो सहर की हर अदा
चाँद औ सूरज को
अपनी ओर खींच
बावरा बना देती है |
ये सभी कुछ, बरसों से
चुपचाप ख़ामोशी से
बिना कुछ बोले, यूँ ही
होता चला आ रहा है |
फिर भी ये ख़ामोशी
आज भी नूतन औ
ताज़गी से परिपूर्ण
आनंदित करती है |
शब्दों की भाषा से
ज़्यादा पुरजोर व
ज़हीन बोली है, इस
खूबसूरत ख़ामोशी की |
लरजती, मचलती,
सरगोशियाँ करती,
सब बयाँ कर जाती है
बिन बोले, इशारों में |
____ हिमांशु

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