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बूंदों की रिमझिम

खिड़की के बाहर
बूंदों की रिमझिम
बन रस की फुहार
मिसरी घोल रही है
बाहर जल-थल
भीतर अंतस-थल
प्रफुल्लित हो रहा है |

तन-मन की थकन
बरखा की फुहार
उड़ा लिए जाती है |
हवा की शीतलता
दिल को चैन औ'
सुकून दिए जाती है

बूंदों संग ठंडी बयार
मन-पर खोल रही है
कभी इस ओर से, तो
कभी उस ओर से
सावन की फुहार
कण-कण का मन
भिगो रही है |

थके हारे चारागर
जहाँ के तहाँ
दम भर के लिए
ठहर से गए हैं
बूंदों की थिरकन में
थम से गए हैं |

कितनी अनूठी,
बला की खूबसूरत,
अतुल सुखदायिनी,
इष्ट फलदायिनी
सभी कष्ट हारिणी
जन जन की चहेती
है ये बरखा की रुत |

लो, रुक गयी बूँदें
धुल गया सब कुछ
हरे हरे पत्ते
धुली धुली डालियाँ
हँसते से फूल औ'
नहाए हुए पंछी,,
सारा आलम ही
बदला बदला सा
चिरंतन अगन को
शमन करता सा |

भाग गयी थकन
दूर हुई कुढ़न
मन पाखी उड़ा
अम्बर में चला
दूर हुए गिले ,,,
दूर क्षितिज पे
देखो तो ज़रा
धरा-अम्बर भी
मिल गए गले |

____हिमांशु

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