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मन की ज़मीं,,,,,

इस ख़ुदाई की कारीगरी भी क्या कहिये जनाब,
किसी पत्थर में मूरत है, कोई पत्थर की मूरत है,
पत्थर के सनम भी यहीं हैं,
पत्थर के देवता भी यहीं,,,
दर्द की इन्तिहा तो तब होती है
जब हज़ारों सोते प्रवाहित करती
मन की ज़मीं पथरीली
होने लगती है,,,,।।
------हिमांशु

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