image1 image2 image3

HELLO I'M Himanshu |WELCOME TO MY PERSONAL BLOG|I LOVE BEAUTY OF KNOWLEDGE|PRINICIPAL OF WPS

Motivations

बदलाव

बदलाव नैसर्गिक है जो अनिवार्य भी है | जो समयानुकूल स्वयं को बदल नहीं पाता, उसका विकास अवरुद्ध हो जाता है| तो यह तो तय है कि बदलाव समय और ज़िन्दगी की मांग व ज़रुरत दोनों है |



हमने बदलाव को अधिकांशतः उपयोगितावाद एवं भौतिकतावाद से जोड़ा है | स्वयं को बदलने के लिए विकास की दौड़ (मेरे हिसाब से `चूहा दौड़ ') में बिना कुछ 'ज्यादा ' सोचे विचारे बस घुस गए हैं | यह दौड़ वास्तव में विकास की ओर ही ले जाएगी - इस बात से अनभिज्ञता बनी रहती है |



इस बदलाव के लिए जो रास्ता चुना जा रहा है वह सिर्फ़ और सिर्फ़ 'स्वहिताय स्वसुखाय' से प्रेरित है - 'सर्वजनहिताय' या 'सर्वजनसुखाय' प्रतिमान बहुत पीछे छूट चूका है|



निश्चय ही भौतिक स्तर पर पनपता यह बदलाव केवल निजी सुविधा और ज़रुरत के इर्द गिर्द सिमटा है जिसके चलते सामाजिकता व सहभागिता से भी दामन छुड़ाना पड़ा है|



सामाजिकता व सहभागिता से दूरी व्यक्तिगत मानसिक धरातल को कमज़ोर कर रही है| दिनों दिन बढ़ते ये तनाव इसी कमजोरी की देन हैं | हम समाज से, परिवार से, खुद अपने आप से कटते जा रहे हैं - खोखले होते जा रहे हैं | सतही तौर पर मानवीय क्षमताएँ बहुत विकसित हुईं हैं - बहुत कुछ हासिल भी हुआ है और निरंतर हो रहा है लेकिन अन्दर ही अन्दर कुछ रिसता जा रहा है , शुष्क होता जा रहा है | संवेदनशीलता तो बीते ज़माने का सा भाव लगता है |



मेलजोल में जो सहजता का भाव मिठास घोलता था, ग़ायब सा हो चुका है - कोरी बनावट, मजबूरी या ज़रुरत सा बन गया है हर रिश्ता | एक लकीर सी पीटता सा ..... हाँ, इस बदलाव से आर्थिक उन्नति ज़रूर हुई है किन्तु सामाजिक ढांचे में कोई सकारात्मक पहलू विकसित हो रहा हो - नज़र नहीं आता|



बदलाव निश्चय ही ज़रूरी है इसमें ज़रा भी संशय नहीं - लेकिन सोच समझकर...अपनी क्षमताओं के अनुरूप ....अपनी मानसिकता के अनुरूप ....पडौसी के बदलाव का स्वरुप ही हमारा भी हो कतई ज़रूरी नहीं | बदली हुई परिस्थितियाँ व्यक्ति, उसके परिवार व समाज के साथ सटीक तालमेल व सामंजस्य लिए हुए होनी चाहियें| आँखें मूंदकर तथाकथित विकास की चूहा दौड़ में भागना सरासर मूर्खता होगी|



परिवर्तन सनातन सत्य है किन्तु समुचित वही माना जाता है जो मन को ऋणात्मक रूप में उद्वेलित न करे, सामाजिक स्तर पर सामंजस्य का भाव रखे, व्यक्ति की भावनाओं के साथ तारतम्य बनाये रखे - तभी वह स्वचालित होगा और उसके परिणाम सकारात्मक, सुखद व दूरगामी होंगे, और वह सर्वग्राह्य भी होगा |



जिसे मन व भाव ग्रहण करने में पीड़ा अनुभव करें....जो समाज से काट दे या सामाजिक मूल्यों से तालमेल न बिठाए....जो संवेगात्मक न हो .....वह बदलाव घातक होगा | कुल मिलाकर, बदलाव की प्रक्रिया नदी के प्रवाह के समान स्वचालित होनी चाहिए, रुके हुए नाले के पानी के जैसी नहीं जिसे बार -बार धकेलना पड़े |

प्रो. हिमांशु महला

CONVERSATION

1 टिप्पणियाँ:

  1. बदलाव

    बदलाव नैसर्गिक है जो अनिवार्य भी है | जो समयानुकूल स्वयं को बदल नहीं पाता, उसका विकास अवरुद्ध हो जाता है| तो यह तो तय है कि बदलाव समय और ज़िन्दगी की मांग व ज़रुरत दोनों है |



    हमने बदलाव को अधिकांशतः उपयोगितावाद एवं भौतिकतावाद से जोड़ा है | स्वयं को बदलने के लिए विकास की दौड़ (मेरे हिसाब से `चूहा दौड़ ') में बिना कुछ 'ज्यादा ' सोचे विचारे बस घुस गए हैं | यह दौड़ वास्तव में विकास की ओर ही ले जाएगी - इस बात से अनभिज्ञता बनी रहती है |



    इस बदलाव के लिए जो रास्ता चुना जा रहा है वह सिर्फ़ और सिर्फ़ 'स्वहिताय स्वसुखाय' से प्रेरित है - 'सर्वजनहिताय' या 'सर्वजनसुखाय' प्रतिमान बहुत पीछे छूट चूका है|



    निश्चय ही भौतिक स्तर पर पनपता यह बदलाव केवल निजी सुविधा और ज़रुरत के इर्द गिर्द सिमटा है जिसके चलते सामाजिकता व सहभागिता से भी दामन छुड़ाना पड़ा है|



    सामाजिकता व सहभागिता से दूरी व्यक्तिगत मानसिक धरातल को कमज़ोर कर रही है| दिनों दिन बढ़ते ये तनाव इसी कमजोरी की देन हैं | हम समाज से, परिवार से, खुद अपने आप से कटते जा रहे हैं - खोखले होते जा रहे हैं | सतही तौर पर मानवीय क्षमताएँ बहुत विकसित हुईं हैं - बहुत कुछ हासिल भी हुआ है और निरंतर हो रहा है लेकिन अन्दर ही अन्दर कुछ रिसता जा रहा है , शुष्क होता जा रहा है | संवेदनशीलता तो बीते ज़माने का सा भाव लगता है |



    मेलजोल में जो सहजता का भाव मिठास घोलता था, ग़ायब सा हो चुका है - कोरी बनावट, मजबूरी या ज़रुरत सा बन गया है हर रिश्ता | एक लकीर सी पीटता सा ..... हाँ, इस बदलाव से आर्थिक उन्नति ज़रूर हुई है किन्तु सामाजिक ढांचे में कोई सकारात्मक पहलू विकसित हो रहा हो - नज़र नहीं आता|



    बदलाव निश्चय ही ज़रूरी है इसमें ज़रा भी संशय नहीं - लेकिन सोच समझकर...अपनी क्षमताओं के अनुरूप ....अपनी मानसिकता के अनुरूप ....पडौसी के बदलाव का स्वरुप ही हमारा भी हो कतई ज़रूरी नहीं | बदली हुई परिस्थितियाँ व्यक्ति, उसके परिवार व समाज के साथ सटीक तालमेल व सामंजस्य लिए हुए होनी चाहियें| आँखें मूंदकर तथाकथित विकास की चूहा दौड़ में भागना सरासर मूर्खता होगी|



    परिवर्तन सनातन सत्य है किन्तु समुचित वही माना जाता है जो मन को ऋणात्मक रूप में उद्वेलित न करे, सामाजिक स्तर पर सामंजस्य का भाव रखे, व्यक्ति की भावनाओं के साथ तारतम्य बनाये रखे - तभी वह स्वचालित होगा और उसके परिणाम सकारात्मक, सुखद व दूरगामी होंगे, और वह सर्वग्राह्य भी होगा |



    जिसे मन व भाव ग्रहण करने में पीड़ा अनुभव करें....जो समाज से काट दे या सामाजिक मूल्यों से तालमेल न बिठाए....जो संवेगात्मक न हो .....वह बदलाव घातक होगा | कुल मिलाकर, बदलाव की प्रक्रिया नदी के प्रवाह के समान स्वचालित होनी चाहिए, रुके हुए नाले के पानी के जैसी नहीं जिसे बार -बार धकेलना पड़े |

    प्रो. हिमांशु महला

    जवाब देंहटाएं