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Hindi Shayari


CONVERSATION

1 टिप्पणियाँ:

  1. फिर शाम चुपके से उतर आई है.....

    खिड़की से फिर शाम

    चुपके से उतर आई है |

    उससे बतियाने

    तनहाइयों को बाँटने

    उसकी सखी बन कर आई है |



    कुछ देर साथ रहेगी

    औ' फिर रात की बग्घी में बैठ

    विदा भी हो जाएगी |



    रह जाएगी वह फिर से अकेली

    कमरे की दीवारों के बीच

    अकेली बैठी .....

    ताकती हुई खिड़की के बाहर

    चारों ओर अँधेरे की चादर |



    दूर किसी मकान के कमरे में

    जलती बत्ती के सिवा

    कुछ भी नहीं है सामने |



    रात सी वीरान उसकी जिंदगी

    क्यूँ नहीं जगमगाती है

    सितारों से, चंदा से !!!

    क्यूँ सिर्फ सियाही सी

    तारी है हर सू !!!!

    यही सोचते सोचते

    कब पौ फटी

    सुबह ने कब दस्तक दी

    उसे अहसास ही नहीं हुआ|



    ____Prof. Himanshu Mahla

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